इतिहास बांचतो कल्पतरू




ओ भारत है, नव विश्व गुरु

इतिहास बांचतो कल्पतरू
लाशां नदियां में, रक्त भौम
किस बिध ई व्यथा रो बखान करूं
नेता तो रकत रा तिरसा है
भाला बरसे सत्ता रे घरूं
मन खून रा आंसू कूके है
मरता री गिणत रो जो ध्यान धरूं
जीवत रा प्राण बचावणीया
थने पुन पुन \’मेघ\’ प्रणाम करूं
मुर्दा ने नोच के खावणीया 
थारे पाप रे घड़ा में रीस भरूं
जद घड़ा फूट कर बिखरेला
थने वादो म्हें बी दिन रो करूं
जद नोच गिरज तने खावे ला
बी दिन री नींव म्हें आज धरूं
जो युद्ध हुवेगो अगले दिन
बी रण भेरी रो गाज करूं
म्हारे मृत्यु री इच्छा राखणीया 
म्हें आज मरूं ना काल मरूं

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